• जैसे नाव में बैठकर दरिया खोजता रहता हूं

    जैसे नाव में बैठकर दरिया खोजता रहता हूंमैं बस अपने होने का मकसद सोचता रहता हूं याद-ए-माजी मेरे आज को गुमराह करता हैजो है नहीं उस जख्म को खरोंचता रहता हूं अपनी आजादी से कोई तो रिहा करो मुझेमैं पतंग अपनी ही डोर को नोचता रहता हूं बुनियाद-ए-इमारत को मजबूत रहना पड़ता हैवो सोचते है…

  • Pearls of Wisdom: Insights from the Elderly (Ages 70-100)

    In a world often fixated on the hustle and bustle of daily life, the wisdom of the elderly can serve as a guiding light, illuminating the path to a more meaningful existence. Recently, I was going through a vlog series where the host asks individuals aged 70 to 100, about their reflections on life. Here…

  • शायद यह खुशनसीबी ही है, गुमनाम हूं

    शायद यह खुशनसीबी ही है, गुमनाम हूंसिर्फ अपने पसंदीदा लोगों का इनाम हूं लोग सब जानेंगे, पहचान पाएंगे नहींमिलेंगे खुशी से मगर काम आएंगे नहीं इक आवाम होगी जो जलती होगीइस खोज में कि कब गलती होगी हां, सपने सब सच अपने हो जाएंगेअधूरा ख्वाब भी किसी के बन जाएंगे अभी अपनों के लिए वक्त…

  • Satirical RCA Report: Power Outage at the NoBlame Corp.

    On January 23rd, 2024, NoBlame Corp’s headquarters experienced a sudden power outage caused by a squirrel electrocution. The incident led to a 30-minute loss of electricity, disrupting employee productivity and resulting in the spoilage of a single frozen pizza. Emergency measures were taken, including calls to the power company and unsuccessful attempts to jump-start the…

  • ज़रूरी था

    होठ फड़फड़ाते रहे मगर कहना ज़रूरी थादबी उस बुंद का आंख से बहना ज़रूरी था बहुत उम्मीद लगाए बैठे थे ज़माने से बचपन मेंअसलियत जानने घर से निकलना ज़रूरी था ऐसा नहीं है कि हार अब रुला नहीं पाती मुझेजानता हूं मूरत का हर घाव सहना ज़रूरी था गम की गैर मौजूदगी में खुशी मायूस…

  • वक्त में खुद को खोया है, या खुद को पाता जाता हूं

    वक्त में खुद को खोया है, या खुद को पाता जाता हूंअब मैं भी वक्त के जैसा हूं, चुपके से आता जाता हूं सुबह की ठंडी लहर हो या कंधे पे नाचता बस्ता होहंसने के कारण हो लाखों, दाम खुशी का सस्ता होखिड़की पर बैठी बूंद को मैं ज़हन में खोया पाता हूंअब मैं भी…

  • वक्त में वापिस जाऊं तो

    वक्त में वापिस जाऊं तो इतना खुद को समझाना हैमकसद कुछ ढूँढना नहीं, खुद ही कुछ बन जाना है गहराई में दबा हुआ बीज खुद को समझना चाहेगाटूटेगा अंदर से लेकिन फिर इक पौधा बन जाएगा सर्द की धूप जो बहलाती है, गर्मी में दर्द दे जाती हैधूप से रिश्ता समझेगा जब खुदको भीगा पाएगा…

  • जिंदगी के उस पड़ाव पर आ चुके है चलते चलते

    जिंदगी के उस पड़ाव पर आ चुके है चलते चलतेखुद इतना बदल गए है खुद से राब्ता करते करते पाक पानी भी रंग बदल लेता है नई सी सौबत सेबन जाते है लोग अंधेरा अंधेरों से डरते डरते मृगजल अक्सर गुमराह कर देता है राहगीर कोबचा लिया है किसी की आदतों ने मरते मरते किनारा…

  • जानता था

    मुफलिसी में इज़्ज़त कमाना जानता थावादा किए बिना निभाना जानता था अधूरा छोड़ देता था सब कुछ मगरअपने काम से दिल लगाना जानता था परेशानी भी परेशान रहती थी उससेवो हर मिसाल हर फ़साना जानता था हकीकत को अपना सपना मानता थाबचपन से क्या सच क्या झूठ जानता था चल जाना था वक्त को आगे…

  • फिर भी

    हर शक्श, किताब ने समझाया था फिर भीसोने की जाल में फंसे, वाकिफ थे फिर भी तैरना आता नहीं हमें उनको मालूम थाझील सी आंखों में डूबा देते थे फिर भी जिंदगी सुलझाने की कुंजी मानते थेबालों में हाथ उलझा लेते थे फिर भी हर स्पर्श सांस रोक देता था हमारापीठ पर चलाते थे उंगलियां…